रीढ़ की चोट के मामले में समय पर इलाज के द्वारा मरीज़ को बचाया जा सकता है : अपोला

 
रीढ़ की चोट के मामले में समय पर इलाज के द्वारा मरीज़ को बचाया जा सकता है : अपोलासादिक़ जलाल, नई दिल्ली।  स्पाइनल यानि रीढ़ की चोट के मामले में मरीज़ को समय पर एवं सुरक्षित रूप से एम्बुलेन्स के द्वारा टर्शरी हाॅस्पिटल तक पहुंचाने के फायदों के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिए इन्द्रप्रस्थ अपोलो हाॅस्पिटल्स ने एक प्रेस सम्मेलन का आयोजन किया।

प्रेस सम्मेलन के दौरान लोगों को बताया गया कि समय पर और सही इलाज उपलबध कराने से कैसे मरीज़ के जीवन को बचाया जा सकता है और अपंगता की संभावना को कम किया जा सकता है।

 डाॅ राजेन्द्र प्रसाद, सीनियर कन्सलटेन्ट, स्पाइन सर्जन, इन्द्रप्रस्थ अपोलो हाॅस्पिटल्स ने युवा मरीज़ों में रीढ़ की चोट के तीन मामलों पर चर्चा की जिनमें समय पर इलाज के चलते मरीज़ का जीवन बचा लिया गया। इसके बाद न्यूरो-रीहेबिलिटेशन के द्वारा उनके खोए न्यूरोलोजिकल फंक्शन्स फिर से सामान्य हो गए। जिसके चलते उन्हें स्थायी अपंगता से बचाया जा सका और आज वे व्हीलचेयर के बजाए अपने पैरों पर चल सकते हैं।

 डाॅ प्रसाद ने बताया, ‘‘21 वर्षीय प्रियंका पहली मंज़िल से गिर गईं, जिसके बाद उनकी पीठ में बहुत तेज़ दर्द था, उनकी टांगों में कमज़ोरी आ गई थी और उन्हें यूरीन रीटेन्शन की समस्या भी हो गई। एमआरआई से पता चला कि उनके एल 1 लम्बर फ्रैक्चर था और फ्रैक्चर के कारण स्पाइनल कोर्ड में कम्प्रेशन हो गया था। डीकम्प्रेशन और स्पाइन के स्थिरीकरण के लिए दो सर्जरियों की ज़रूरत थी। उन्हें ठीक होने में तीन महीने का समय लगा और अब वे अपने पैरों पर चल सकती हैं। इस मामले में सफल इलाज का श्रेय उनके परिवार को दिया जा सकता है जिन्होंने बिना देरी किए सुरक्षित रूप से उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया। जब वह अस्पताल पहुंची, उनकी टांगों में पैरालिसिस था और वह अपना ब्लैडर फंक्शन खो चुकी थीं। प्रियंका ने कहा, ‘‘मैं डाॅ तरूण साहनी और डाॅ राजेन्द्र प्रसाद की मेडिकल टीम के प्रति आभारी हूंँ, जिनकी वजह से आज में ठीक हूँ और जल्द ही मेरी शादी होने वाली है।’’

 23 वर्षीय अखिलेश कुमार अपने कार्यस्थल पर उंचाई से गिर गए। ‘‘उनका मामला बहुत गंभीर था, उन्हें काॅम्प्लेक्स मैनेजमेन्ट प्रक्रिया की ज़रूरत थी। जब उन्हें अस्पताल लाया गया तो उनके सिर और स्पाइन में चोट लगी थी, टांग और पैल्विक में कई फ्रैक्चर थे, जिसके चलते टांगों में कमज़ोरी आ गई थी। वे अपना ब्लैडर और बोवल फंक्शन खो चुके थे। बाएं पटेला और कैल्सेनियस (हील बोन) के फ्रैक्चर के लिए उनकी सर्जरी की गई, इसके अलावा स्पाइनल कोर्ड नव्र्स पर बने दबाव को हटाने एवं स्पाइन के स्थिरीकरण के लिए स्पाइन सर्जरी भी करनी पड़ी। हालांकि सर्जरी के बाद अखिलेश में काफी सुधार हुआ है, लेकिन उनके पैर में अभी भी कुछ कमज़ोरी है। उन्हें अभी और रीहेबिलिटेशन की ज़रूरत है।’’ यह मामला भी हमें बताता है कि पाॅली-ट्राॅमा के गंभीर मामलों में मरीज़ को समय पर और सुरक्षित रूप से अस्पताल पहुंचाना कितना महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में कई ट्राॅमा  विशेषज्ञ एक टीम के रूप में काम करते हैं और आपसी तालमेल के साथ मरीज़ की देखभाल की जाती है।

 सर्जरी के बाद अखिलेश ने कहा, ‘‘मैं हमेशा की तरह कन्स्ट्रक्शन साईट पर काम कर रहा था और अचानक उंचाई से गिर कर बेहोश हो गया। सर्जरी के सात दिनों बाद मैं होश में आया और मुझे पता चला कि मेरे साथ इतनी गंभीर दुर्घटना घटी है। मैं अपने सहकर्मियों के प्रति आभारी हूँ जो मुझे तुरंत अस्पताल लेकर आए। डाॅ राजेन्द्र प्रसाद और उनकी टीम के प्रयासों की वजह से आज मैं जिंदा हूँ। मैं अब ठीक हो रहा हूँ और वाॅकर की मदद से चल सकता हूँ। डाॅ प्रसाद ने मुझे बताया कि पूरी तरह से ठीक होने के लिए मुझे अभी और इलाज की ज़रूरत है।’’

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