ज़मीन में नहीं है, हलक में नहीं है, पानी की चर्चा पानी में भी नहीं है...

 
ज़मीन में नहीं है, हलक में नहीं है, पानी की चर्चा पानी में भी नहीं है...
रवीश कुमार 
गर्मी चढ़ने लगी है। पानी की समस्या को लेकर हमारी लीपापोती उखड़ने लगी है। कल बांदा यूपी से किसी ने मेसेज किया। नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहता था। बताया कि बांदा में पानी की समस्या गंभीर हो चुकी है। पीने के लिए पानी नहीं मिल रहा है। लोग गंदा पानी पीकर बीमार हो रहे हैं। मैंने चेक तो नहीं किया मगर मय प्रमाणपत्र वो बता रहा था कि 15 लोग पानी के कारण अस्पताल में भर्ती हुए हैं।
ज़मीन में नहीं है, हलक में नहीं है, पानी की चर्चा पानी में भी नहीं है...

पोस्ट के साथ अख़बार की क्लिपिंग देखिए। गुजरात का संदेश अख़बार है। इन तस्वीरों पर बात होती तो आज चैनलों में दिखने वाला भारत कुछ और दिखता। पहले दिखता था मगर अब इनकी जगह स्टुडियो में स्थायी सेट बन गए हैं। उसी में एंकर लोग बड़बड़ा कर समझते हैं कि पत्रकारिता कर रहे हैं। ऐसी ख़बरें होती भी हैं तो स्पीड न्यूज़ में भदभद करते हुए चली जाती हैं। आप लाख तर्क खोज लाएं, चैनलों की प्रासंगिकता आपको भरमाने में ही रह गई है। एक भ्रम पाल लिया है लोगों ने कि वहां पत्रकारिता हो रही है।
ज़मीन में नहीं है, हलक में नहीं है, पानी की चर्चा पानी में भी नहीं है...

आप इन तस्वीरों के ज़रिए ग्रामीण गुजरात में पानी के संकट का हाल देखिए। राज्य के 203 डैम में 23 प्रतिशत पानी बचा है। गुजरात का विकास है। हर समय पानी के समाधान को लेकर नकली बातें करते देखा है। वही हाल गंगा सफाई का भी है। कोई पूछता भी नहीं कि गुजरात विधानसभा चुनाव में एक जहाज़ पानी में उतरा था। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए। वो जहाज़ कितने दिनों से नहीं उतरा है। वाराणसी में पानी का जहाज़ कोलकाता से पेप्सिको का सामान लेकर चला था। वह जहाज़ दोबारा क्यों नहीं चला। नर्मदा डैम को लेकर कितनी राजनीति की। कितना भाषण दिया। इससे भी आंशिक समाधान ही हुआ।

प्रधानमंत्री के पास समाधान के नाम पर स्लोग होता है। कुछ भी बोल देना है। हमारे देश में पानी का उत्सव होना चाहिए। इस पर शेखर कपूर ट्विट कर देते हैं। हमारे देश में पानी को लेकर हज़ारों उत्सव हैं। कुंभ का संबंध भी पानी से है, बालू से नहीं है। अभी हाल में बोल दिया कि लेफ्ट लिबरल ने गंगा पर ध्यान नहीं दिया। हंसी आती है। रिपोर्टर पूछ देता सिर्फ इतना कि आप ध्यान दे रहे थे तो आपके राज में प्रो जी डी अग्रवाल की मौत क्यों हुई। उन्हें आमरण अनशन क्यों करना पड़ा। प्रो जी डी अग्रवाल ही थे जिन्होंने मीडिया संसार को गंगा की समस्या के बारे में शिक्षित किया था।
ज़मीन में नहीं है, हलक में नहीं है, पानी की चर्चा पानी में भी नहीं है...

गांव गांव में लोग पानी ख़रीद कर पीने लगे हैं। यह पानी कहां से आ रहा है? भू जल से। बिहार में भयंकर तरीके से भू-जल से पानी लेकर सप्लाई किया जा रहा है। एक तो पानी के कारोबारी रोज़ ज़मीन का पानी निकालकर टैंपों से बेच रहे हैं। दूसरा सरकार भी यही कर रही है। पाइप से पानी पहुंचाने की योजना के पीछे सबरसिमल है। भू-जल से पानी निकालो और पाइप से पहुंचा दो। अगर ऐसा है तो इस पर पहले जमकर हंसा जाना चाहिए और फिर रोया जाना चाहिए। मूर्खता कितनी आसानी से विद्वता के रूप में स्थापित हो जा रही है।

जहां पानी का संकट नहीं है वहां भी संकट तेज़ी से करीब आ रहा है। हाल ही में इसी फेसबुक पेज पर भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता निर्गुणी ने पोस्ट किया था सरायरंजन में भू-जल का स्तर गिरा। वहीं हमने देखा था कि सड़क पार के गांव में सबरसिमल से पानी खींचा जा रहा है। सड़क पार के गांव का भू-जल गिर गया। हैंडपंप बेकार हो गए। वहां के लोग ये समझ रहे हैं कि हमारे गांव में भी नीतीश सरकार ने सबरसिमल नहीं लगाया। हमारी रिपोर्ट के बाद वहां सबरसिमल लगने लगा है। लेकिन मुझे पता है कि यह समस्या का समाधान नहीं है। समस्या की शुरूआत है।

अनुपम मिश्र अक्सर कहा करते थे कि पानी की समस्या का समाधान बहुत आसान है। कम से कम पैसे वाला है। सरकारों ने अधिक से अधिक पैसे का खेल बना दिया।
(लेखक मशहूर पत्रकार व न्यूज़ एंकर हैं)

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