जानिए क्या है तीन तलाक और हलाला पर खेल?

 
जानिए क्या है तीन तलाक और हलाला पर खेल?मोहम्मद ज़ाहिद 
आज लोकसभा में मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और फिर उस पर मतदान होना है। यूं तो मोदी सरकार पर कोई खतरा नहीं बल्कि उसके पास बहुमत से अधिक आँकड़े हैं परन्तु महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पिछले चार सालों में विपक्ष की हर माँग और बात को अपने जूते की नोंक पर रखने वाली मोदी सरकार एक सेकेन्ड में अपने विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव को लाने के लिए तैय्यार कैसे हो गयी ?

क्युंकि चुनाव करीब है और उसे एक मंच चाहिए जहाँ की आवाज़ पूरे देश में गूंजे , और झूठ बोलने में तो इस सरकार और संगठन के एक से एक योद्धा हैं।

तो आज संसद के इस मंच का इस्तेमाल वही सब करने के लिए किया जाएगा जिसका आधार झूठ और सिर्फ़ झूठ होगा।

इसी झूठ में एक झूठ होगा "तीन तलाक और हलाला" पर चिल्लपों। यह एक विफल मोदी सरकार का वह खेल है जिससे वह अपने ज़हरीले समर्थकों को यह दिखाना चाह रही है कि वह मुसलमानों के खिलाफ़ काम कर रही है।

दरअसल तीन तलाक और हलाला मुसलमान औरतों की कोई समस्या है ही नहीं और विशेषकर "हलाला" शब्द को तो मुसलमान भूल ही चुका है पर भगवा गिरोह केवल दुष्प्रचार करने के लिए इन सभी शब्दों को ढूंढ लाया है।

तीन तलाक और हलाला यदि मुसलमान औरतों की समस्या होती तो देश की 8 करोड़(मुस्लिम महिलाएँ) आबादी में सिर्फ़ लक्ष्मी वर्मा जैसी फराह फैज़ ही सामनें ना आतीं बल्कि 8 करोड़ आबादी सड़कों पर होती और इस्लाम के विरुद्ध विद्रोह हो जाता।

दरअसल तीन तलाक और हलाला पर बहस करना या इनके विरुद्ध कानून बनाना वैसा ही है जैसे आज समाप्त हो चुके "सती प्रथा" के विरुद्ध कानून बनाना।

हलाला एक ऐसी भूल चुकी व्यवस्था थी जिसके डर से लोग तलाक जैसा शब्द भी अपनी ज़बान पर ना लाएँ तो तलाक अपने कटु वैवाहिक संबन्धों को त्यागने का बेहद आसान तरीका है। हलाला एक डर था जिसके कारण लोग तलाक की व्यवस्था का बहुत ज़रूरी और कोई विकल्प ना होने की सूरत में ही प्रयोग करें।

इसके बावजूद , हलाला की व्यवस्था जानबूझ कर या नियत के तहत नहीं की जाती थी बल्कि एक वैवाहिक संबन्ध के खत्म होने के बाद वह औरत अपनी मर्जी और बिना किसी दबाव या फिर तलाक लेने की नियत से दूसरी शादी करती है और यह शादी भी टूट जाती है तब वह अपने पहले पति से अपनी मर्जी से फिर विवाह कर सकती है , उस पहले पूर्व पति के लिए यह औरत अब "हलाल" है जो कि उसके तलाक देने के बाद "हराम" हो गयी थी।

यह है "हलाला"

इस धार्मिक व्यवस्था का कुछ लोग गलत इस्तेमाल करते होंगे तो कौन से अन्य धर्म के लोग अपने धर्म की व्यवस्था का गलत इस्तेमाल नहीं करते ? और किस धर्म के लोगों की धार्मिक व्यवस्था को उनसे सही रूप में मनवाने के लिए संसद और उच्चतम न्यायालय में लगातार बहस हुई है ?

कभी नहीं , ऐसा कानून बनता तो सारे संघी और भाजपाई जेल में होते पर कानून केवल मुसलमानों के लिए बनेगा कि वह अपनी धार्मिक व्यवस्था का दुरुपयोग ना करें बल्कि ऐसे सही प्रयोग करें नहीं तो दो साल की सश्रम कारावास।

हकीकत यही है कि भाँड मीडिया और राजनैतिक दल यदि हलाला का इतना शोर ना मचाते तो 99•99% मुसलमान हलाला शब्द से ही अनभिज्ञ होते।

उच्चतम न्यायालय के संदर्भ में चलिए एक बार मान भी लें कि मुस्लिम समाज में हलाला होता है तो जो उच्चतम न्यायालय हर दिन लोगों को सेक्स की आज़ादी देता फैसला सुनाता है , यह वैध , ऐसे वाला वैध , वैसे वाला वैध , आगे वाला वैध , पीछे वाला वैध दाएँ बाएँ सब तरफ वाला वैध , बिना विवाह का वैध , अपनी मर्जी से किसी अनजान से वैध , लिव इन वाला वैध इत्यादि इत्यादि , वह किसी मुस्लिम महिला के अपनी मर्जी से "हलाला" करने पर ऐतराज़ क्युं करता है ?

क्या उस मुस्लिम औरत की मर्जी उच्चतम न्यायालय के फ्री सेक्स से संबन्धित तमाम फैसलों के अंतर्गत नहीं आते ? कि वह तलाक बाद किसी से विवाह कर सके या उसके साथ शारीरिक संबन्ध बना सके ? और फिर उससे तलाक ले सके ?


क्या उसका अधिकार उच्चतम न्यायालय और संसद छीन लेगी ?
(मोहम्मद जाहिद सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं। इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी UPUKLive.com स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। लेख के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी upuklive@gmail.com भेजें।)

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