नक्सली आतंक की बुनियाद बारूदी सुरंग विस्फोट

 
नक्सली आतंक की बुनियाद बारूदी सुरंग विस्फोट जगदलपुर। इम्प्रूवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) यानी बारूदी सुरंग छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में सक्रिय नक्सलवाद का सबसे घातक हथियार माना जाता है। बारूदी सुरंग के विस्फोट से ही बस्तर संभाग में नक्सलवाद का अस्तित्व कायम है। जब तक विस्फोटकों के निर्माण से लेकर उपयोग तक केंद्र और राज्य की कड़ी निगरानी नहीं होगी तब तक बस्तर में नक्सलवाद के आतंक का अस्तित्व कायम रहेगा।
इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि विस्फोटकों के उत्पादन में बारकोड की अनिवार्यता को कड़ाई से लागू किया जाए बगैर बारकोड के किसी भी प्रकार का विस्फोटक का उत्पादन प्रतिबंधित किया जावे। यह मांग पुलिस एवं सुरक्षाबलों के अधिकारी सरकार से करते रहे हैं। जिस पर गंभीरता के साथ ध्यान देने की आवश्यकता है। बारूदी सुरंग की तलाशी में उपयोग किए जाने वाले मेटल डिटेक्टर से बचने के लिए नक्सली बारूद को प्लास्टिक कंटेनर में भरकर उपयोग करने लगे हैं, साथ ही अधिक मात्रा में बारूद का इस्तेमाल करते हुए विस्फोटकों को अधिक गहराई में रखकर  मेटल डिटेक्टर से बचाने में सफल हो रहे हैं।
नक्सलवाद के संदर्भ में देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि नक्सलवादियों के पास हथियारों की कमी है, जिससे पुलिस-सुरक्षा बल आसानी से निपट सकते हैं, लेकिन बस्तर के बड़े हिस्से में  लौह अयस्क सहित कई खनिज भंडार मौजूद है, जहां खनन के लिए भारी माऌत्रा में बारूद  का उपयोग  किया जाता है। यहीं से बारूद की आसानी से नक्सलियों तक उपलब्धता से नक्सली बड़ी वारदातों को अंजाम दे कर अपनी उपस्थिति से भय का वातावरण बनाने में कामयाब हो जाते हैं। यही नक्सलवाद को ताकतवर बनाकर और बस्तर में दशकों से उनके वजूद को स्थापित किए हुए है।
इसके अलावा राजनीतिक स्वार्थ भी नक्सलियों के अस्तित्व को स्थापित रखने में मददगार साबित होता है। राज्य एवं केंद्र की राजनीतिक इच्छाशक्ति के बगैर नक्सलवाद को समाप्त करना मुमकिन नहीं है।
बारूदी सुरंग के विस्फोट से बस्तर में नक्सलियों द्वारा एंटी लैंडमाइन  व्हीकल को उड़ाने की वारदातों पर पीछे मुड़कर देखना आवश्यक है। 28 मई 2003 नारायणपुर में एंटी लैंडमाइन व्हीकल को विस्फोट से उड़ाया गया जिसमें तीन जवान शहीद हुए।
12 मई 2005 को नारायणपुर में पुन: विस्फोट की घटना को अंजाम दिया गया।
03 सितंबर 2006 बीजापुर के बैंगलोर मार्ग पर विस्फोट से सीआरपीएफ के 24 जवान व एक एसपीओ शहीद हुए।
18 मई 2008 नारायणपुर के फरसगांव में विस्फोट से तत्कालीन एसपी व पुलिस जवान बाल बाल बचे।
02 मई 2009 दंतेवाड़ा के जगरगुंडा के पास एंटी लैंडमाइन व्हीकल पर विस्फोट जवान बाल बाल बचे।
09 जून 2011 को दंतेवाड़ा के गौतम के पास एंटी लैंडमाइन विकल उड़ाई गई, 8 एसपीओ व 2 डी एफ के जवान शहीद।
13 मई 2018 को सुकमा के किस्टाराम में एंटी लैंडमाइन व्हीकल को विस्फोट से उड़ाया गया, जिसमें 9 जवान शहीद हो गए।
विगत छह दशक से नक्सलवाद का दंश झेल रहे बस्तर संभाग को बारूदी सुरंग और विस्फोटों से मुक्त कराना आवश्यक है। उपरोक्त एंटी लैंडमाइन व्हीकल के विस्फोट से उड़ाने की घटनाओं को देखा जाए, तो यह स्पष्ट है कि एंटी लैंडमाइन व्हीकल नक्सलियों के बारूदी विस्फोट से नहीं बच पा रहे हैं, ऐसे में आम बुलेट पू्रफ वाहन का बचना संभव ही नहीं है। इसका ताजा उदाहरण दंतेवाड़ा के विधायक भीमा मंडावी के बुलेट प्रूफ कार की दुर्दशा से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
बस्तर संभाग से नक्सलवाद का सफाया आवश्यक है। सभी राजनीतिक दलों को राजनीतिक हितलाभ के लिए नक्सलियों का उपयोग करना उनके स्वयं के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। बलीराम कश्यप के पुत्र तानसेन कश्यप की नक्सलवादियों द्वारा हत्या हो, या झीरम घाटी में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर बस्तर के कद्दावर कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा के हत्या की नक्सली वारदात हो अथवा वर्तमान  दंतेवाड़ा के विधायक भीमाराम मंडावी की हत्या की नक्सली घटना हो, यह सभी घटनाएं बस्तर संभाग के समस्त उन नेताओं के लिए संकेत है कि नक्सलवाद की समस्या को समाप्त करने की दिशा में सभी एकमत और एकजुट हो जाएं, अन्यथा बस्तर संभाग के सभी आदिवासी नेताओं को इसका सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
बस्तर संभाग की भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए यदि नक्सलियों तक बारूद की उपलब्धता पर विराम लगाने की दिशा में कारगर कदम उठा लिया जाए, तो विस्फोट से होने वाले बड़ी नक्सली वारदातों पर अंकुश लगाया जा सकता है और यह कदम नक्सलवाद की समस्या को समाप्त करने के लिए कारगर भी होगा। बारूद की उपलब्धता को लेकर बस्तर आईजी विवेकानंद सिन्हा ने कहा कि विस्फोटकों पर बारकोड की अनिवार्यता आवश्यक कर देनी चाहिए, जिससे विस्फोटकों के सप्लाई चैन तक पहुंचा जा सकता है और विस्फोटक की उपलब्धता पर लगाम लगाया जा सकता है। 

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