Ramadan: वक्त के साथ बदला सहरी में 'जगाने का तरीका'

 
Ramadan: वक्त के साथ बदला सहरी में 'जगाने का तरीका'

मुहम्मद फैज़ान | faizan@upuklive.com 

आधुनिकता की चका-चौंध में जहां टैक्नोलॉजी लोगों की जिंदगी में अहम हो गयी है, वहीं पुराने तौर तरीके नदारद होते दिख रहे हैं। सहरी में रोज़ा रखने के लिए जगाने के तरीकों में भी पिछले तीस वर्षों में तमाम बदलाव देखे गए हैं। UPUKLive.com से बातचीत में लोगों ने तीस वर्ष पहले के तौर-तरीकों पर चर्चा की। 
बचपन की यादें ताजा करते हुए हाजी शहादत, शहजाद सिद्दीकी, इरफान आदि ने बताया कि सहरी का वक्त होने पर एक बूढ़ा आदमी कंधे पर लाठी, हाथ में लालटेन लिए घर-घर जाकर कुंडी खटखटाने के साथ जोर-जोर से ‘सहरी का वक्त हो चुका है, सब लोग जाग जाओ’ कहते हुए आगे बढ़ जाता था। उसके बाद लोगों को जगाने का सिलसिला शुरू होता था। शरीफनगर निवासी अकरम ने बताया गांव के बच्चे शाही मस्जिद की छत पर बहुत बड़े नगाड़े को डंडों से बजाते थे, जिसकी आवाज आसपास के गांवों तक जाती थी। जामा मस्जिद की छत पर एक स्टैंड पर लोहे की लेन तार से बांधकर लटकी हुई होती थी, जिसे बच्चे छोटी हथौड़ी से बजाते थे। उस घंटी की टन-टन मौहल्ले भर के लोगों को जगाने के लिए मजबूर कर देती थी। वक्त बदला, तौर तरीके बदले और इसकी मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर इस्तेमाल होने लगे। 
पिछले दो-तीन वर्षों की ही बात करें तो मस्जिदों व अन्य स्थानों पर लगे लाउडस्पीकरों पर सहरी में लगभग दो बजे से सहरी में जगाने का ऐलान करके बीच-बीच में नात-ए-पाक पढ़ी जाने लगीं। लेकिन इस वर्ष यह सिलसिला भी लगभग खत्म हो चुका है। अब रोज़दारों को मस्जिदों में लगा सायरन जगाता है। जबकि कुछ बंद घरों में आबादी से दूर के घरों में रहने वाले रोज़दार मोबाइल व अलार्म घड़ी से ही सहरी में जागते हैं। कहीं-कहीं बारूदी गोला भी सहरी में जगाने व सहरी खत्म होने के वक्त छोड़ा जाता है। 
अपने पड़ौसियों को सहरी में जगाएं


मौलाना अब्दुल गफ्फार ने बताया कि सहरी के  वक्त रोज़दार को जगाने वाले शख्स को भी उतना ही सवाब मिलता है जितना सहरी खाने वाले को मिलता है, जबकि उसके सवाब में कोई कमी नहीं आती। सहरी खाना बहुत बड़ी सुन्नत है, सहरी में कुछ खाने को मन नहीं कर रहा तो कम से कम एक गिलास पानी पी लें। पड़ौसियों व मौहल्ले के लोगों को भी सहरी खाने के लिए उठाएं, जहां तक मुनासिब हो।

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