एक बेहतरीन कवि भी थे संगीत सम्राट तानसेन !

 
एक बेहतरीन कवि भी थे संगीत सम्राट तानसेन !
ध्रुव गुप्त 
संगीत सम्राट तानसेन भारतीय शास्त्रीय संगीत के कुछ शिखर पुरुषों में एक रहे हैं। ग्वालियर के हजरत मुहम्मद गौस और वृंदावन के स्वामी हरिदास के शिष्य तानसेन सम्राट अकबर के दरबारी गायक और उनके नवरत्नों में से एक थे। कई मध्यकालीन ऐतिहासिक दस्तावेज़ उनकी गायन प्रतिभा के उल्लेखों से भरे पड़े हैं।

 'आईने अकबरी' के लेखक इतिहासकार अबुल फज़ल ने उनके बारे में कहा था - 'पिछले एक हज़ार सालों में उनके जैसा गायक नहीं हुआ।' उनके गहरे मित्र और प्रशंसक भक्त कवि सूरदास ने उनके बारे में लिखा है - भलो भयो विधि ना दिए शेषनाग के कान / धरा मेरू सब डोलते तानसेन की तान ! तानसेन एक अप्रतिम गायक के अलावा भी बहुत कुछ थे, लेकिन उनका सांगीतिक व्यक्तित्व इतना बड़ा था कि उसके पीछे उनके व्यक्तित्व के दूसरे तमाम पहलू ओझल हो गए। बहुत कम लोगों को पता है कि ग्वालियर के पास एक छोटे-से गांव बेहट के चरवाहे से सम्राट अकबर के दरबार के प्रमुख गायक के ओहदे तक पहुंचे तानसेन अपने समय के एक बेहतरीन कवि भी थे। रसखान की तरह कृष्ण की भक्ति में आकंठ डूबे हुए कवि ।

दुखद बात यह है कि ज्यादातर इतिहासकार तानसेन के विलक्षण व्यक्तित्व को उद्घाटित करने के बजाय उनकी धार्मिक आस्था के विवाद में ही उलझे रहे हैं। कुछ लोग तानसेन को हिन्दू मानते हैं, तो कुछ लोग मुसलमान। अबुल फज़ल की किताब 'अकबरनामा' और इतिहासकार स्मिथ की किताब 'अकबर: द ग्रेट मुग़ल' से प्रमाणित है कि मियां तानसेन मूलतः हिन्दू थे। उनका मूल नाम संभवतः रामतनु पांडेय था। एक शहज़ादी के प्रेम में पड़कर अपनी जवानी के दिनों में उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया था। उस शहज़ादी से उन्हें चार पुत्र - सुरतसेन, शरतसेन, तरंगसेन और विलास ख़ान और एक पुत्री सरस्वती हुई थी। उनके सभी पुत्र संगीत विद्या में पारंगत थे। लगभग 83 साल की उम्र में देहांत के बाद उनकी इच्छानुसार तानसेन को उनके जन्मस्थान ग्वालियर में उनके उस्ताद हज़रत मुहम्मद गौस के मक़बरे के पास दफ़नाया गया था जहां हर वर्ष तानसेन संगीत समारोह का विराट आयोजन होता है।

तानसेन के कवि व्यक्तित्व के बारे में इतिहासकारों और साहित्य के आलोचकों द्वारा भी नहीं के बराबर लिखा गया। इसकी वजह शायद यह है कि कविकर्म तानसेन की महत्वाकांक्षाओं में शामिल नहीं था। वे स्वान्तःसुखाय ही लिखते थे। वे आमतौर पर अपनी ही लिखी बंदिशें ही गाते थे। उनकी कविताओं का विषय उस दौर के दूसरे कवियों की तरह भक्ति ही होती थी। कृष्ण उनके प्रिय पात्र थे। कृष्ण के प्रति उनकी श्रद्धा और समर्पण को उस काल के अन्य कृष्णभक्त कवियों के समकक्ष रखकर देखा जा सकता है। यत्रतत्र मिले उल्लेखों से पता चलता है कि उनकी काव्य कृतियों के नाम थे - रागमाला, संगीतसार और गणेश स्रोत्र। 'रागमाला' में उन्होंने कुछ दोहे भी लिखे थे, जिनमें से एक प्रसिद्द दोहा देखिए - सुर मुनि को परनायकरि, सुगम करौ संगीत / तानसेन वाणी सरस जान गान की प्रीत। तानसेन द्वारा रचित ज्यादातर पद और दोहे विलुप्तप्राय हैं। वे कहीं न कहीं सुरक्षित अवश्य होंगे जिन्हे खोजकर अगर सामने लाया जाय तो तानसेन महान संगीतकार के अलावा मध्यकाल के एक सशक्त भक्त कवि के तौर पर भी स्थापित होंगे। उनके कुछ पद संगीत की पुरानी किताबों में अब भी सुरक्षित हैं। तानसेन के दो पदों से आज आप भी रूबरू होईए !

एक /
चरन-सरन ब्रजराज कुंवर के
हम विधि-अविधि कछ नहिं समुझत, रहत भरोसे मुरलीधर के।
रहत आसरे ब्रज मंडल में, भुजा छांह तरुवर गिरधर के।
तानसेन के प्रभु सुखदायक, हाथ बिकाने राधावर के।

दो /
केते दिन गए री अलेखे आली, हरि बिनु देखे।
उरजु तपक नख-सिख कारन, नैन तपे बिनु देखे।
पतियां न पठावत है, आपु न आवत है, रही रही हों धोखे।
तानसेन के प्रभु सब सुखदायक, जीवन जात परेखे।
(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं)

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