तो सुप्रीम कोर्ट की पहल पर हुई मध्यस्थता भी फेल हो गई

 
तो सुप्रीम कोर्ट की पहल पर हुई मध्यस्थता भी फेल हो गई
एसपी मित्तल 
सब कुछ ठीक रहा तो आगामी 25 जुलाई से राम मंदिर भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई शुरू हो जाएगी। 11 जुलाई को पांच सदस्यीय संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने मध्यस्थता कमेटी के प्रमुख कलीफुल्ला को निर्देश दिए हैं कि अब तक की प्रगति रिपोर्ट 18 जुलाई को कोर्ट में पेश की जाए। इस रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद ही 25 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट कोई निर्णय लेगा।

असल में हिन्दू पक्षकारों ने याचिका प्रस्तुत कर कहा कि कोर्ट ने अयोध्या विवाद को निपटाने के लिए जो कमेटी बनाई है वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं है। ऐसे में कोर्ट को अपने स्तर पर ही निर्णय देना चाहिए। इस याचिका पर ही कोर्ट ने मध्यस्थता कमेटी को निर्देश दिए हैं। मोटे तौर पर अब यह साफ हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में भूमि विवाद को निपटाने के लिए जो मध्यस्थता कमेटी बनाई वह विफल हो गई है।

यदि हिन्दू और मुसलमानों की आपसी सहमति से ही यह मामला निटता तो 70 वर्ष पहले ही निपट जाता। हालांकि उत्तर प्रदेश के कई मुस्लिम संगठनों ने अयोध्या में विवादित भूमि हिन्दू समाज को देने पर सहमति दी है, लेकिन इस मुद्दे पर राजनीति करने वाल नहीं चाहते हैं कि यह मामला खत्म हो जाए। पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट में भी विवादित भूमि पर मंदिर होने की बात कही गई है।

इस्लाम में भी माना गया है कि विवादित भूमि पर मस्जिद नहीं बनाई जानी चाहिए। लेकिन कुछ लोग इस मुद्दे को बनाए रखना चाहते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को साक्ष्य के आधार पर अपना निर्णय जल्द देना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कह चुके हैं कि कोर्ट के निर्णय के बाद ही सरकार अपना रुख स्पष्ट करेगी। सरकार चाहे तो विादित भूमि का अधिग्रहण कर मंदिर का निर्माण करवा सकती है, लेकिन सरकार ऐसा करने के पक्ष में नहीं है। सरकार चाहती है कि पहले सुप्रीम कोर्ट फैसला दे।

अच्छा हो कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई इस मामले में 25 जुलाई से नियमित सुनवाई करवाएं और जल्द से जल्द फैसला दें। वैसे भी यह मामला करोड़ों हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है। सवाल यह भी है कि भगवान राम का मंदिर उनके जन्म स्थान पर नहीं बनेगा तो फिर क्या पाकिस्तान में बनेगा?

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