चौंकाने वाला है वायु प्रदूषण के कारण मौतों का आंकड़ा

 
चौंकाने वाला है वायु प्रदूषण के कारण मौतों का आंकड़ा वायु प्रदूषण के कारण देश में जिस हिसाब से मौतें हो रही हैं, वह आंकड़ा वाकई चौंकाने वाला है। उस पर हैल्थ इफेक्ट इंस्टीच्यूट की हालिया रिपोर्ट और भी कान खड़े करने वाली है, जिसने देश को समय रहते प्रभावी पग उठाने की सलाह दी है। वायु प्रदूषण के मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आंकड़ों में भारत के जिन शहरों को सबसे ज्यादा प्रदूषित बताया गया है, उनमें प्रदेश सरकारों द्वारा लाजिमी कदम उठाने में बरती जा रही कोताही है।

इसका खमियाजा समूचे देश को भुगतना पड़ रहा है। फिर केंद्र सरकार के इस बाबत उठाए गए प्रयास कहां पर्याप्त हैं? पिछले एक दशक से लाखों लोगों, भले ही वे गरीब हों या अमीर, के स्वास्थ्य से इसी वायु प्रदूषण की वजह से खिलवाड़ हो रहा है। लोग ताजा सांस लेने को तरस गए हैं। कोई ऐसा नहीं बचा है, जिसे एलर्जी, कफ, आंखों में जलन, दिल के रोगों के अलावा फेफड़ों की बीमारी न हो।

जो धूम्रपान नहीं करते, वायु प्रदूषण के कारण वे भी इन्हीं रोगों का शिकार हो रहे हैं। जो ताजा आंकड़े जारी हुए हैं, उनके मुताबिक तम्बाकू का सेवन करने वालों की सेहत ज्यादा खराब है। फिर चाहे घर हो या बाहर, दोनों ठौर में वायु प्रदूषण में इजाफा कर रहे हैं।

वहीं घरों में केरोसीन तेल तथा ईंधन के रूप में प्रयुक्त की जाने वाली लकड़ी के प्रयोग पर कड़ी निगरानी और उस पर अमल ही हमें भयावह स्थिति से बचा सकता है। बेशक धुएं से फैलते प्रदूषण की जगह घर-घर गैस सिलेंडर प्रयुक्त होने लगा है लेकिन अभी इस ओर अधिक प्रयासों की दरकार है। तभी घर के अंदर पैदा होने वाले प्रदूषण से निजात मिलेगी।

फिर घर से बाहर कालिख, धूल के कण, ओजोन, सल्फर तथा नाइट्रस ऑक्साइड के अलावा अपने वाहनों व फैक्टरियों के साथ ही बिल्डिंग निर्माण कार्यों पर रोक लगानी पड़ेगी, अगर इच्छित परिणाम चाहिए। अब चूंकि आम चुनाव होने जा रहे हैं, इन चुनावों में क्यों न वायु प्रदूषण को चुनावी मुद्दा बनाया जाए? बार-बार स्वच्छ हवा के प्रलोभनों के लिए अपनाई गयी वादाखिलाफी की सरकारी नीति से जनता तो पहले ही परेशान है।

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