पतली कमर का विज्ञान...

 
पतली कमर का विज्ञान...
ध्रुव गुप्त 
हमारे प्राचीन संस्कृत साहित्य से लेकर मध्यकाल का रीति साहित्य तक कृशकाय नायिकाओं की पतली कमर के कीर्तिगान से भरा पड़ा है। कहीं-कहीं तो पतली कमर की यशगाथा ऐसी अतिशयोक्तिपूर्ण होती है कि पढ़ने वालों की हंसी छूट जाए।

एक प्राचीन कवि की प्रेमिका की कमर कुछ इस क़दर पतली थी कि वह बेचारा कभी समझ ही नहीं पाया कि उसकी देह के निचले और ऊपर वाले हिस्से एक दूसरे से जुड़े हुए कैसे थे। पिछले दौर की उर्दू शायरी भी कमर-मोह से कम ग्रस्त नहीं रही थी। उस दौर का एक शेर देखिए - 'लोग कहते हैं कमर है / कहां है, किस तरह की है, किधर है' !

हमारी पुरानी हिंदी फिल्मों के नायकों को नायिका की पतली, लचकती कमर दिन में तारे दिखाती ही रही थी। यह और बात है कि उस दौर के ज्यादातर नायक-नायिकाओं के हिस्से में कमर नहीं, 'कमरा' हुआ करता था। मुझे पतली कमर के प्रति यह दीवानगी कभी समझ नहीं आई। आज एक खबर देखी तो न सिर्फ मेरी आंखें खुली, बल्कि पुराने कवियों और शायरों की वैज्ञानिक दृष्टि का भी पता चल गया।

इंग्लैंड के सिटी यूनिवर्सिटी और कॉस बिज़नेस स्कूल ने वहां के स्वास्थ विभाग से प्राप्त बीस साल के आंकड़ों के विश्लेषण से सेहत और लंबे जीवन का एक और रहस्य खोज निकाला है। उनका यह पुख्ता दावा है कि जिन लोगों की कमर पतली होती है, वे न सिर्फ सेहतमंद ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठाते हैं, बल्कि उनकी ज़िंदगी लंबी भी होती है। 'कमरा' वालों से बेशक कुछ साल ज्यादा। शोध के मुताबिक़ किसी व्यक्ति की कमर की चौड़ाई उसकी कुल लंबाई की आधी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। मसलन यदि किसी की लंबाई पांच फ़ीट छह इंच यानी 66 इंच है तो 33 इंच तक की कमर उसके लिए आदर्श है।

कौन कहता है कि हमारे देश के लोगों के पास वैज्ञानिक सोच का अभाव है ? विज्ञान जिस कमर तक आज पहुंचा है, हमारे स्वप्नदर्शी कवि वहां हजारों साल पहले ही पहुंच गए थे।

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