92 साल से देश की एक तंग गली मे हाथ से लिखा जाता है यह अखबार!

 
92 साल से देश की एक तंग गली मे हाथ से लिखा जाता है यह अखबार!नई दिल्ली। आप किसी न्यूज़ पेपर के दफ्तर में जाते हैं तो आपको अक्सर कंप्यूटर दिखाई देते हैं लेकिन जब आप ‘द मुसलमान’ के दफ्तर में जायेंगे तो आपको रीड कलम, स्याही की बोतलें, कागज के ढेर दिखाई देंगे, जिनपर सबसे पहले आपकी नजरें जाती हैं. यह शायद दुनिया का ऐसा पहला अखबार है जो 91 साल का हो चुका है और आज भी हाथ से लिखा जाता है।
92 साल से देश की एक तंग गली मे हाथ से लिखा जाता है यह अखबार!
द मुसलमान को 1927 में आरिफुल्लाह के दादा सैयद अजातुल्ला ने शुरू किया था। उन्होंने महसूस किया था कि उस वक़्त मुसलमानों के लिए कोई आवाज़ उठाने वाला नहीं था, तब उन्हें लगा कि मुसलमानों की भी एक आवाज होनी चाहिए। चेन्नई की प्रतिष्ठित वाल्लाजह मस्जिद के बगल में एक छोटी सी तंग गली में स्थित इस अख़बार का कार्यालय है।
92 साल से देश की एक तंग गली मे हाथ से लिखा जाता है यह अखबार!
अख़बार शुरू होने के बाद से तीन संपादकों को देखा है. अजातुल्ला उनके पुत्र सैयद फजलुल्ला और अब आरिफुल्ला।चार पेज के ब्रॉडशीट में लगभग सभी लेखों का चयन अरिफुल्ला द्वारा खुद किया जाता है,उनका कहना है कि वह देश के विभिन्न हिस्सों में उनके कई पत्रकार हैं लेकिन वह द इकोनोमिस्ट की तरह बाईलाइंस नहीं लेते हैं। दो अनुवादक हैं जो उर्दू में खबरों का अनुवाद करते हैं,पेन का इस्तेमाल करते हुए प्रत्येक समाचार आइटम को ब्रॉडशीट में लिखा जाता है।

सुलेख वास्तव में कागज की आत्मा है लेकिन तकनीक के आगमन के साथ पहले के समाचार पत्रों और उर्दू प्रकाशन गृहों में कार्यरत कैटिब, अनावश्यक हो गए हैं,श्रीनगर का औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान उन सरकारी संस्थानों में से एक जहां उर्दू सुलेख को पढ़ाया जाता था, आखिर में 2016 मई में इसे पाठ्यक्रम से हटा दिया गया था।

अरिफुल्ला करते हैं कि अब उर्दू के लिए आजकल कुशल लेखकों को ढूंढ़ना एक चुनौती है, कड़ी मेहनत के के बाद खबर में विज्ञापनों को भी जोड़ दिया जाता है।कागज 1 बजे दोपहर के आसपास प्रिंट होता है और शाम तक अपने 21,000 पाठकों में से अधिकांश तक पहुंच जाता है। अख़बार की कीमत 75 पैसे है लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अख़बार आज भी चल रहा है।

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