लाहौर की बादशाही मस्जिद: जहां भाई की हत्या के बाद औरंगजेब ने बुना था साम्राज्य का सपना
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पाकिस्तान के लाहौर में स्थित बादशाही मस्जिद, मुगल साम्राज्य की वैभवशाली विरासत का प्रतीक है, लेकिन इसके निर्माण के पीछे छिपी कहानी उतनी ही क्रूर है। यह मस्जिद 1673 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने बनवाई थी, जो अपने भाई दारा शिकोह की हत्या के बाद की गई। यह स्थल न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि मुगलों के राजनीतिक और धार्मिक उन्माद का भी प्रतीक है।
दारा शिकोह की हत्या और मस्जिद का निर्माण
1675 में, औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहां को कैद कर लिया और सिंहासन हासिल करने के लिए अपने बड़े भाई दारा शिकोह का सिर कटवा दिया। दारा शिकोह, जो उदारवादी विचारों के लिए जाना जाता था, औरंगजेब के कट्टर इस्लामी विचारों के विरोधी थे। उसकी हत्या के बाद, औरंगजेब ने अपने साम्राज्य के विस्तार और इस्लाम के प्रचार के लिए बादशाही मस्जिद का निर्माण करवाया। यह मस्जिद न केवल एक धार्मिक स्थल थी, बल्कि उसके राजनीतिक प्रभुत्व का प्रतीक भी बनी।
बादशाही मस्जिद: मुगल वास्तुकला का अनुपम उदाहरण
बादशाही मस्जिद का डिज़ाइन दिल्ली की जामा मस्जिद से मिलता-जुलता है, जिसे शाहजहां ने बनवाया था। यह मस्जिद लाहौर किले के नज़दीक स्थित है और मुगल काल की भव्यता को दर्शाती है। इसमें तीन बड़े गुंबद, आठ मीनारें और विशाल आंगन हैं। यहाँ एक साथ 55,000 लोग नमाज अदा कर सकते हैं। मस्जिद के अंदरूनी हिस्से में मुगलों के समय की कलाकारी और नक्काशी देखी जा सकती है।
विवादों में घिरी मस्जिद: दारा शिकोह की हत्या का साया
बादशाही मस्जिद का निर्माण औरंगजेब के भाई की हत्या के बाद हुआ, जिसने इसे विवादों में डाल दिया। 2011 में, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या के बाद, यह मस्जिद फिर से चर्चा में आई। तासीर की हत्या के आरोपी ने मस्जिद के अंदर ही उन्हें गोली मार दी थी। यह घटना ने मस्जिद के धार्मिक और राजनीतिक महत्व को एक बार फिर उजागर किया।
आधुनिक समय में मस्जिद का सांस्कृतिक महत्व
आज, बादशाही मस्जिद पाकिस्तान की दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद है और पर्यटन का केंद्र भी बन गई है। यहाँ हर साल लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। मस्जिद के परिसर में एक छोटा संग्रहालय भी बनाया गया है, जो मुगल काल की कला और इतिहास को प्रदर्शित करता है। हालांकि, इसके निर्माण के पीछे की क्रूर कहानी हमेशा याद दिलाती है कि यह स्थल न केवल धार्मिक भावनाओं का प्रतीक है, बल्कि मुगलों के क्रूर शासन का भी गवाह है।